गुरुवार, 22 जनवरी 2015

क्षणिकायें
{१} 
ऐ सुनो!
थामकर फिर से कूची
तुम अपने हाथों में
होकर के तल्लीन
पुनः अपने ही जज्बातों में
कुछ अनदेखे सपनों को
साकार बनाओ ना!
ऐ सुनो!
आज तुम फिर से कोई
चित्र बनाओ ना!
{२}
कितने सपने चूर हो गये,
कितने अपने दूर हो गये!
हम कितने मजबूर हो गये!
पगडंडी से राजमार्ग तक आते-आते!
अबकी बार मिलोगे तो,
बतला देंगे!
  {3}
सुन साथी!
एक वक़्त
जीवन में, ऐसा भी आएगा!
जहाँ,
असुंदर और सुन्दर का
कुछ,
महत्त्व ना रह जायेगा...
सुन साथी!
क्या तुम्हें पता है,
जीवन में उस वक़्त..
काम क्या आएगा....
नहीं पता ना...
सुन साथी!
प्रेम और विश्वास
सार है जीवन का....
बिना प्रेम
अस्तित्व नहीं कुछ जीवन का..
गर,
तुम और मैं
मिलकर हम बन जायेंगे...
निश्चित,
सारी दुनिया पर छा जायेंगे..!!
{४}
तुझको,
जो बनना है
बन जा.
मुझको देशी रहने दे...
मैं पंछी,
उनमुक्त गगन का
मुझको
मुक्त ही रहने दे ...
साजिश
रचना छोड़
सनम
तू,
मेरे पंख कतरने की..
बार-बार,
हर बात पे
साथी !
मुझे परखना रहने दे...!!
{५}
बहुत दिनों के बाद
आज
फिर मन है
कुछ लिखने का..
अब ये उलझन है
क्या लिक्खूँ ..?
कविता,
गीत,
ग़ज़ल
लिक्खूँ
या
सिर्फ
तुम्हारा नाम!
{६}

तुम बिन जीवन
कैसा जीवन ..,
ना ही मुमकिन
ना नामुमकिन!
{७}
"परछाइयां,
जो चूमती थीं पैर हमारे..,
ढल गया सूरज,
 तो अब ये,
सर पे चढ़के नाचती है!
(८) 
आपा धापी में,
हम सब ये भूल गये,
चमक-दमक की
नकली दुनियाँ के पीछे,
कुदरत निर्मित
एक असली दुनियाँ भी है!
{९}
चंदा भी क्या चीज़ अज़ब है!
आशिक़ को बिंदिया सा लगता,
भूखे को लगता रोटी सा
बच्चों को लगे खिलौना सा
माँ को परदेश में बेटी सा!
चंदा भी क्या चीज़ गज़ब है!
{१०}
प्यार,
अकेला भी जी लेता है!
दुनियाँ में लेकिन,
बिछड़ जायें गर दोस्त,
तो दोनों
सिसक-सिसककर
मर जाते हैं! 





 

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