जब दरपन में खुद से आँख मिलाता हूँ,
सच कहता हूँ जीते जी मर जाता हूँ!
घर से बेघर, दर दर भटक रहा हूँ मैं,
सबको लगता है मैं अच्छा खासा हूँ!
वो जो एक खता की थी, बरसों पहले,
सज़ा उसी की हर लमहे में पाता हूँ!
मैं बेशक़ एक दिवस जीवन जीऊँ दिन भर,
पर रोज़ रात को एक सदी मर जाता हूँ!
जिसको मैंने अपना सब कुछ माना है,
उसको भी तो कहाँ आज कल भाता हूँ!
सच कहता हूँ जीते जी मर जाता हूँ!
घर से बेघर, दर दर भटक रहा हूँ मैं,
सबको लगता है मैं अच्छा खासा हूँ!
वो जो एक खता की थी, बरसों पहले,
सज़ा उसी की हर लमहे में पाता हूँ!
मैं बेशक़ एक दिवस जीवन जीऊँ दिन भर,
पर रोज़ रात को एक सदी मर जाता हूँ!
जिसको मैंने अपना सब कुछ माना है,
उसको भी तो कहाँ आज कल भाता हूँ!

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