अगर
जीवन में,
कभी समर्थ हुआ तो,
खोलूँगा
अपनी खुद की
एक छोटी सी दुकान!
बिखरी होगी खामोशी
जहाँ चारो ओर,
हर किसी को मिलेंगी जहाँ
जहान भर खुशियाँ
और
आसमान भर सपने !
वो भी एक दम मुफ्त...
क्योंकि, तब तो मैं समर्थ होऊँगा ना!
जीवन में,
कभी समर्थ हुआ तो,
खोलूँगा
अपनी खुद की
एक छोटी सी दुकान!
बिखरी होगी खामोशी
जहाँ चारो ओर,
हर किसी को मिलेंगी जहाँ
जहान भर खुशियाँ
और
आसमान भर सपने !
वो भी एक दम मुफ्त...
क्योंकि, तब तो मैं समर्थ होऊँगा ना!
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें