समंदर में बहुत पानी है लेकिन,
हमारी आँख से थोड़ा सा कम है!!
मैं गाँव लौट कर जाउँ भी तो जाउँ कैसे,
अना तो पहले ही मैं ख़ाक में मिला आया!!
कतरे-कतरे में हैं दरिया, हर ज़र्रे में रेगिस्तान!
जो महसूस कर सके इनको, है वो ही सच्चा इंसान!!
ये तेरा ज़िस्म है या रेत है समंदर की,
मैं मुट्ठी बंद करूँ हूँ ये फ़िसल जाता है!!
तू मेरी है ये हर इक शख्स जानता है यहाँ,
फिर भी देखे है तुझे जो, वो मचल जाता है!!
मेरा नसीब है कि तू मेरे नसीब में हैं,
मेरे नसीब से हर शख्स जला जाता है!!
वो तो खुद में ही एक ग़ज़ल है जी,
उस पे कैसे ग़ज़ललिखे कोई!!
बहुत कुछ है जो कहना चाहता हूँ,
कोई सुनने को राजी हो तो पहले!!
क़फ़स मुक्त होकर, खुला आकाश पाकर ,
परिंदा खूब रोया, परों में मुँह छिपाकर!!
बहुत कुछ था जो कह सकता था लेकिन,
बहुत ख़ामोश था वो मेरे पहलू में आकर!!
हमारी आँख से थोड़ा सा कम है!!
मैं गाँव लौट कर जाउँ भी तो जाउँ कैसे,
अना तो पहले ही मैं ख़ाक में मिला आया!!
कतरे-कतरे में हैं दरिया, हर ज़र्रे में रेगिस्तान!
जो महसूस कर सके इनको, है वो ही सच्चा इंसान!!
ये तेरा ज़िस्म है या रेत है समंदर की,
मैं मुट्ठी बंद करूँ हूँ ये फ़िसल जाता है!!
तू मेरी है ये हर इक शख्स जानता है यहाँ,
फिर भी देखे है तुझे जो, वो मचल जाता है!!
मेरा नसीब है कि तू मेरे नसीब में हैं,
मेरे नसीब से हर शख्स जला जाता है!!
वो तो खुद में ही एक ग़ज़ल है जी,
उस पे कैसे ग़ज़ललिखे कोई!!
बहुत कुछ है जो कहना चाहता हूँ,
कोई सुनने को राजी हो तो पहले!!
क़फ़स मुक्त होकर, खुला आकाश पाकर ,
परिंदा खूब रोया, परों में मुँह छिपाकर!!
बहुत कुछ था जो कह सकता था लेकिन,
बहुत ख़ामोश था वो मेरे पहलू में आकर!!
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