बुधवार, 4 मार्च 2015


अपने गीतों पर सारी दुनियाँ को नाच नचाऊँगा,

जाने वो दिन कब आयेगा, मैं मंचों पर गाऊँगा!!
प्रतिभा दम ना तोड़ दे मेरी, रोटी की जद्दोहद में,
कब रोटी का व्यूह तोड़कर, सच से आँख मिलाऊँगा!!

रविवार, 1 मार्च 2015

जो जा रहा है, मुझको मुफ़लिसी में छोड़कर!
है मुझको यकीं जल्द ही आयेगा लौटकर!!
मुझको अकेला छोड़के कागज़ की नाव में,
गुम हो गया है नाख़ुदा  पतवार तोड़कर!!
मुझसे बड़ा नाफ़हम यहाँ कौन मिलेगा,
जो आब-ए-चश्म पी रहा है जाम छोड़कर!!
माँ को ये लगे है मेरा बेटा मजे में है,
बेटा बशर करे है आसमान ओढ़कर!!
नाआश्ना भी मुझको नवाजेंगे दुआ से,
जाउँगा मैं जिस ऱोज ज़माने को छोड़कर!!



(नाफ़हम मूर्ख, आब-ए-चश्म- आँसू, नाआश्ना- अजनबी)  

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015


जब तलक पेट में रोटी थी, मैं भी खूब उड़ा!

आजकल रोटियों के वास्ते ’पर’ बेच रहा हूँ!!




आज अचानक किसी बात पर, फिर आया वो याद!

नामुमकिन है भूलना, पहला-पहला प्यार!!



सफर में है सफ़ीना जब तलक तू हाथ थामे रख,

मुझे पतवार से ज्यादा भरोसा तुझ पे है साथिन!!



जिन्हें जिम्मा मिला है, ज़ख्म पर मरहम लगाने का,

वो खुद आवाम के जख्मों को ताजा कर रहे है!!


खिलौने तोड़ने की उम्र में, मज़लूम के बच्चे,

खिलौने बेचकर घर का गुजारा कर रहे हैं!



ख़ुदख़ुशी के और भी लाखों तरीक़े थे मगर,

तेरे आगे हाथ फ़ैलाना मुझे अच्छा लगा!!



साजिशें लाखों हुईं उसको बुझाने की मगर,

ओट में उसकी हथेली की दिया जलता रहा!!



ये जो आशाओं के दीपक राजधानी में जले हैं,

है मुझे उम्मीद ये मेरा भी घर रोशन करेंगे!!


चाँद-तारों, फूल-ख़ुशबू में उलझ कर रह गई है,
जो ग़ज़ल, मैं उस ग़ज़ल को, रोटियों तक लाऊंगा!!
हो गई है ग़ुम ग़ज़ल जो हुस्न के बाज़ार में,
उस ग़ज़ल को फिर से घर  की बेटियों तक लाऊँगा!!

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015


शाम होगी तो फिर सेहन में लौट आयेगा,
मेरा बच्चा अभी बच्चा है, कहाँ जायेगा!!

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

साजिशें लाखों हुईं उसको बुझाने की मगर,

ओट में उसकी हथेली की दिया जलता रहा!!
ध्वनी प्रदूषण पर चर्चा को आयोजित एक अनुष्ठान में,

इतनी बजी तालियाँ मेरा मन मस्तिक तक सुन्न हो गया!!

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

वह आदमी भी पेड़ की शाखों की तरह था,
हर रोज टूटता रहा, हर रोज फूटता रहा!!